नई दिल्ली. कृषि कानून में बदलाव को लेकर किसान सड़कों पर हैं. वह लगतार केंद्र सरकार से कृषि कानून में बदलाव की मांग कर रहे हैं. लेकिन मोदी सरकार के कान पर जू तक नहीं रेंग रही है. यही वजह है कि किसानों ने पिछले कई दिनों से दिल्ली की घेराबंदी की हुई है. किसान नेता सरकार को बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर उनकी मांगे मानी न गई तो सरकार को गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए. किसानों को गृहमंत्री अमित शाह और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर लगातार समझाने बुझाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन किसान नेता एमएसपी की गांरटी की मांग को लेकर किसी भी कीमत पर झुकने के लिए तैयार नहीं हैं. वहीं, किसान नेताओं का कहना है कि उनके पास एक साल का राशन पानी मौजूद है. उनका कहना कि अगर हमें अपने हक के लिए कई साल भी लड़ना पड़ा तो हम पीछे नहीं हटेंगे.

पांचवें दौर की बातचीत विफल

आज किसानों और सरकार के बीच पांचवे दौर की बैठक बेनतीजा ही खत्म हो गई. अब आगामी 9 दिसंबर को छठे दौर की बैठक होगी. इस बीच, किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने बैठक में केंद्र सरकार को धमकी भरे अंदाज में कहा कि अगर सरकार ने उनकी मांग नहीं मानी तो वो हिंसा के रास्ते पर जा सकते हैं.

8 दिसंबर को भारत बंद का एलान

किसान अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं. सरकार से कई दौर की बातचीत विफल रहने के बाद अब किसान 8 दिसंबर को भारत बंद करेंगे. किसानों का अब यह आंदोलन जगआंदोलन की शक्ल लेता जा रहा है.

पहली बार घिरी मोदी सरकार

पीएम नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की थी. इस दौरान सरकार ने नोटबंदी, तीन तलाक, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाना और राम मंदिर जैसे कई मुद्दों पर काम किया. लेकिन मोदी सरकार को पहली बार इस तरह का विरोध सहना पड़ रहा है. यह पहली बार है जब मोदी सरकार पर इतना दबाव पड़ रहा है. सरकार अंदर ही अंदर भयभीत नजर आ रही है क्योंकि सामने कोई और नहीं बल्कि देश का मेहनती अन्नदाता खड़ा है और जहां किसान खड़ा हो जाता है वहां जीत की गारंटी होती है.

किसान आंदोलन सरकार को भारी न पड़ जाए

कृषि कानून में बदलाव को लेकर जिस तरह से किसान सड़कों पर है उससे मोदी सरकार को सचेत होने की जरूरत है. चूंकि जब कोई आंदोलन जगआंदोलन की शक्ल ले लेता है तो सरकार की नींव हिलना तय माना जाता है.

अन्ना आंदोलन ने कांग्रेस को उखाड़ फेका

समाजसेवी अन्ना हजारे ने साल 2011 में जनलोकपाल बिल को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान पर अनशन किया था. इस मुहिम में अन्ना के साथ धीरे-धीरे सारा देश जुड़ गया था. बच्चा, बूढ़ा और जवान हर कोई अन्ना की मांग के समर्थन में सड़क पर उतर गया था. अन्ना के आंदोलन के आगे सरकार को झुकना पड़ा था. वहीं, इस आंदोलन से अरविंद केजरीवाल नेता के रूप में उभर कर सामने आए थे. लेकिन यह अन्ना का ही आंदोलन था, जिसकी वजह से कांग्रेस साल 2014 में सत्ता बचाने में नाकाम साबित हुई थी.

मोदी सरकार के ताबूत में आखिरी कील तो नहीं?

जिस तरह से अन्ना आंदोलन ने कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से उखाड़ फेकने में अहम भूमिका निभाई थी. कही ऐसे ही किसान आंदोलन भी मोदी सरकार के लिए मुसीबत न बन जाए. आज के समय में युवा बेरोजगारी को लेकर परेशान है. व्यापारी जीएसटी की वजह से परेशान है. आम जनता को महंगाई मार रही है और बाकी कसर कृषि कानून ने पूरी कर दी. लेकिन अब मोदी सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि इस बार उसका पाला देश के अन्नदाता से पड़ा है. अगर सरकार ने किसानों की आवाज को दबाने या कुचलने की कोशिश की तो यकीन मानिए बीजेपी का देश में दोबारा न आना लगभग तय है.

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